मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (MP High Court) की इंदौर बेंच ने धार के ऐतिहासिक भोजशाला मंदिर और कमाल मौला मस्जिद परिसर के धार्मिक प्रकृति के विवाद को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने साफ किया है कि विवादित भोजशाला कॉम्प्लेक्स मूल रूप से वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर और एक ऐतिहासिक संस्कृत अध्ययन केंद्र था। कोर्ट ने इसके साथ ही मुस्लिम पक्ष की याचिका को खारिज करते हुए कमाल मौला मस्जिद के दावे को पूरी तरह नकार दिया है। अदालत ने इस मामले से जुड़ी पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर लंबी सुनवाई के बाद 12 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज यानी शुक्रवार (15 मई 2026) को सुनाया गया।
ASI का 2003 वाला आदेश हुआ रद्द
हाई कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले के तहत आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) द्वारा साल 2003 में जारी किए गए उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसके तहत हिंदुओं के पूजा अधिकार को प्रतिबंधित किया गया था और मुस्लिम समुदाय को वहां नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई थी।
कोर्ट ने कहा कि इस स्थल पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता समय के साथ कभी समाप्त नहीं हुई है। श्रद्धालुओं को मूलभूत सुविधाएं, उचित कानून व्यवस्था और देवता की पवित्रता का संरक्षण देना एक संवैधानिक कर्तव्य है। अदालत ने मस्जिद के लिए वैकल्पिक स्थान (Alternative space) के लिए जमीन आवंटन का फैसला सरकार पर छोड़ दिया है और कहा कि मुस्लिम पक्ष इसके लिए आवेदन कर सकता है।
ऐतिहासिक साहित्य और ASI रिपोर्ट बनी आधार : MP High Court Decision
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने हजारों दस्तावेजों, अलग-अलग धार्मिक विश्वासों और कानूनी पहलुओं पर गहन विचार किया। कोर्ट के इस बड़े निष्कर्ष के पीछे दो मुख्य आधार रहे:
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ऐतिहासिक साहित्य और साक्ष्य: ऐतिहासिक साहित्य और पुरातात्विक संदर्भ इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस स्थल पर पहले से ही देवी सरस्वती का मंदिर और गुरुकुल (संस्कृत अध्ययन केंद्र) स्थापित था।
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ASI की साइंटिफिक सर्वे रिपोर्ट: ASI ने इस मॉन्यूमेंट के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद 2,000 से ज्यादा पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना वहां मस्जिद के मुकाबले पहले से मौजूद थी। वहां मौजूद विवादित ढांचा मूल मंदिर के हिस्सों (जैसे खंभे, मूर्तियां, सिक्के और शिलालेख) का फिर से इस्तेमाल करके बनाया गया था।
मुस्लिम पक्ष के आरोप खारिज
सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने ASI की साइंटिफिक सर्वे रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए उसे ‘पक्षपातपूर्ण’ बताया था और दावा किया था कि इसे हिंदू पक्ष के दावों को मजबूती देने के लिए तैयार किया गया है।
हालांकि, ASI ने कोर्ट में इसका कड़ी दलीलों के साथ खंडन किया। ASI ने बताया कि यह सर्वेक्षण पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया और एक्सपर्ट्स की मदद से किया गया था। इस 98 दिनों तक चले विस्तृत सर्वेक्षण के दौरान टीम में तीन मुस्लिम जानकार भी शामिल थे और इस समुदाय के प्रतिनिधि भी मौके पर हर वक्त मौजूद थे। कोर्ट ने ASI के तर्कों को सही मानते हुए मुस्लिम पक्ष के सभी आरोपों को खारिज कर दिया।
त्रिशक्ति दावा: हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्ष
इस विवादित परिसर पर मुख्य रूप से तीनों समुदायों के अलग-अलग दावे थे:
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हिंदू समुदाय: इसे मूल रूप से वाग्देवी (देवी सरस्वती) का ऐतिहासिक मंदिर मानता है।
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मुस्लिम समुदाय: इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है।
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जैन समुदाय: एक जैन याचिकाकर्ता ने भी इस परिसर में मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल होने का दावा पेश किया था।
हाई कोर्ट ने सभी पक्षों की विस्तृत दलीलों और सबूतों को देखने के बाद अब साफ कर दिया है कि इस संरचना की धार्मिक प्रकृति मंदिर की ही है। कोर्ट ने अब केंद्र सरकार और ASI को भोजशाला मंदिर के आगे के प्रशासन और प्रबंधन (Administration and Management) पर फैसला लेने के निर्देश दिए हैं।
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