NCR : राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के प्रमुख शहरों में कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन (C&D) यानी निर्माण और तोड़फोड़ से निकलने वाला मलबा (सीएंडडी वेस्ट) पर्यावरण और वायु प्रदूषण के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एक हालिया सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, साइबर सिटी गुरुग्राम समेत पूरे हरियाणा और एनसीआर में कचरा और मलबा प्रबंधन की स्थिति बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है। वर्तमान आंकड़ों के मुताबिक अकेले गुरुग्राम की सड़कों और खाली भूखंडों पर 36 हजार 500 टन मलबा लावारिस फैला हुआ है, जो शहर की स्वच्छता और वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
एनसीआर के शहरों में गुरुग्राम में सीएंडडी वेस्ट का संकट सबसे विकराल रूप ले चुका है। आधुनिक और ‘स्मार्ट सिटी’ की दौड़ में शामिल इस शहर में प्रतिदिन 1500 टन निर्माण कचरा उत्पन्न हो रहा है। नगर निगम की ढीली कार्यप्रणाली और कचरा उठाने के टेंडरों में बार-बार होने वाले प्रशासनिक बदलावों के कारण निस्तारण की रफ्तार बेहद धीमी है। सरकार द्वारा अब इस संकट से निपटने के लिए गुरुग्राम के शेष निस्तारण (प्रोसेसिंग) प्लांट को पूरा करने की अंतिम तिथि 28 फरवरी 2027 निर्धारित की गई है।
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला और चिंताजनक पहलू औद्योगिक शहरों फरीदाबाद और मानेसर को लेकर सामने आया है। इन दोनों बड़े आर्थिक केंद्रों में मलबे के वैज्ञानिक निस्तारण का बुनियादी ढांचा वर्तमान में पूरी तरह शून्य (Zero) बना हुआ है।
फरीदाबाद का हाल: फरीदाबाद में प्रतिदिन 300 टन सीएंडडी वेस्ट उत्पन्न हो रहा है और इतना ही प्रशासन द्वारा एकत्र भी किया जा रहा है। लेकिन, वहां प्रोसेसिंग की क्षमता शून्य होने के चलते रोजाना 300 टन का पूरा का पूरा गैप बना हुआ है। नतीजा यह है कि शहर में जगह-जगह मलबे के अवैध पहाड़ खड़े हो रहे हैं। सरकार ने अब फरीदाबाद में नया प्रोसेसिंग प्लांट लगाने के लिए 30 मार्च 2027 की समय-सीमा तय की है।
औद्योगिक हब मानेसर: मानेसर की स्थिति भी फरीदाबाद से अलग नहीं है। वहां भी बुनियादी ढांचे के अभाव में हजारों टन मलबा खुले में फेंककर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। मलबे और कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण (Scientific Disposal) की यह समस्या सिर्फ बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि हरियाणा के छोटे और उभरते शहरों के सामने भी यह बहुत बड़ी चुनौती बन चुकी है।
रिपोर्ट में राज्य के अन्य जिलों के चौंकाने वाले आंकड़े इस प्रकार हैं:
पानीपत में रोजाना 32 टन कचरा उत्पन्न हो रहा है, जिसमें से निगम केवल 27 टन ही एकत्र कर पाता है। वर्तमान में यहाँ प्रोसेसिंग कैपेसिटी शून्य है, जिससे रोजाना 32 टन का भारी अंतर आ रहा है। इस गैप को भरने के लिए प्लांट लगाने की समय-सीमा 30 दिसंबर 2026 तय की गई है।
रोहतक में दैनिक रूप से 95 टन और सोनीपत में 40 टन कचरा पैदा हो रहा है। दुर्भाग्य से, इन दोनों ही महत्वपूर्ण शहरों में भी मलबे और कचरे की प्रोसेसिंग फिलहाल पूरी तरह शून्य बनी हुई है।
सीएम सिटी करनाल में रोजाना 5 टन कचरा निकलता है। यहां भी प्रोसेसिंग क्षमता शून्य होने से 5 टन का ही अंतर बना हुआ है। प्रशासन ने यहाँ आगामी 30 जून 2027 तक प्लांट को हर हाल में चालू करने का लक्ष्य रखा है।
जमीनी स्तर पर जांच करने पर सामने आया कि गुरुग्राम नगर निगम (MCG) पिछले दो वर्षों में बार-बार डोर-टू-डोर वेस्ट कलेक्शन और मलबा निस्तारण के टेंडरों में बदलाव करता रहा है या उन्हें रद्द करता रहा है। इसके अलावा, सफाई कर्मचारियों और दमकल कर्मियों की समय-समय पर होने वाली हड़तालों ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। मुख्य सड़कों से लेकर रिहायशी सेक्टरों और खाली पड़े प्लॉट्स तक में लोगों द्वारा रात के समय अवैध रूप से कचरा फेंकने की वजह से ‘गार्बेज वल्नरेबल पॉइंट्स’ की संख्या 250 के पार पहुंच चुकी है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि तय समय-सीमा के भीतर इन शहरों में प्रोसेसिंग प्लांट शुरू नहीं किए गए, तो आने वाले समय में एनसीआर में हवा की गुणवत्ता (AQI) और बदतर हो जाएगी।
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